स्मृति घर में रखी जा सकती है। बुद्ध जैसे प्यारे आदमी की स्मृति जिस घर में नहीं है वह घर अधूरा है। और जीसस का सूली पर लटका हुआ चित्र जिस घर के भीतर नहीं है, उस घर के बच्चों को पता नहीं कि कितने अदभुत लोग जमीन पर हो चुके हैं।
लेकिन पूजा मत करना। प्रेम करना, पूजा नहीं। क्योंकि पूजा दूसरा ही अर्थ रखती है। पूजा यह कहती है कि इस पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड्ने से मुझे मुक्ति मिल सकती है। यह बेवकूफी की शुरुआत हो गई। किसी मूर्ति के और किसी चित्र के सामने बैठने से मुक्ति नहीं मिल सकती। और कोई मूर्ति और कोई चित्र भगवान तक पहुंचने का रास्ता नहीं बन सकता। कोई मूर्ति भगवान नहीं है। मूर्ति और चित्र उन प्यारे लोगों की स्मृतियां हैं जो जमीन पर हो चुके हैं। और उनकी स्मृति न रखी जाए, यह मैंने कभी भी नहीं कहा है।
मैं मूर्तियों के मंदिर बनाने के खिलाफ हूं। लेकिन घर—घर में मूर्तियां हों, इसके पक्ष में हूं। एक—एक घर में मूर्तियां हों। लेकिन मूर्तियां भगवान की तरह नहीं, एक पवित्र स्मरण की तरह, एक सैक्रेड रिमेंबरिंग की तरह। जमीन पर कुछ फूल हुए हैं मनुष्य के जीवन में, कुछ मनुष्य हुए हैं जो खिल गए हैं पूरे, उनकी याद अगर आदमी रखे तो मैं कैसे उसके खिलाफ हो सकता हूं?
ओशो
लेकिन पूजा मत करना। प्रेम करना, पूजा नहीं। क्योंकि पूजा दूसरा ही अर्थ रखती है। पूजा यह कहती है कि इस पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड्ने से मुझे मुक्ति मिल सकती है। यह बेवकूफी की शुरुआत हो गई। किसी मूर्ति के और किसी चित्र के सामने बैठने से मुक्ति नहीं मिल सकती। और कोई मूर्ति और कोई चित्र भगवान तक पहुंचने का रास्ता नहीं बन सकता। कोई मूर्ति भगवान नहीं है। मूर्ति और चित्र उन प्यारे लोगों की स्मृतियां हैं जो जमीन पर हो चुके हैं। और उनकी स्मृति न रखी जाए, यह मैंने कभी भी नहीं कहा है।
मैं मूर्तियों के मंदिर बनाने के खिलाफ हूं। लेकिन घर—घर में मूर्तियां हों, इसके पक्ष में हूं। एक—एक घर में मूर्तियां हों। लेकिन मूर्तियां भगवान की तरह नहीं, एक पवित्र स्मरण की तरह, एक सैक्रेड रिमेंबरिंग की तरह। जमीन पर कुछ फूल हुए हैं मनुष्य के जीवन में, कुछ मनुष्य हुए हैं जो खिल गए हैं पूरे, उनकी याद अगर आदमी रखे तो मैं कैसे उसके खिलाफ हो सकता हूं?
ओशो